सिंगोली। नीमच जिले के रतनगढ नगर घाट से सटा हुआ बसा है। प्राचीनकाल में बारिश के बूंद—बूंद पानी का संचय किस तरह से किया जाता है। वर्तमान आधुनिक युग में रतनगढ में निर्मित जल सरंचनाओं से पता लगाया जा सकता है। इसका ग्रांथों में भी जिक्र है।
पाँच हजार वर्ष पूर्व की सिंधु नदी घाटी की सभ्यता, मोहनजोदड़ो, लोथाल आदि इसके उदाहरण हैं। कुएँ, तालाब यहाँ तक कि पानी की निकासी के लिए बनाई गई नालियाँ इस बात की साक्षी है कि पानी की आपूर्ति व स्वास्थ रखरखाव का कितना ध्यान रखा जाता था। प्राचीनकाल का बेजोड उदाहरण हमारे सामने है। आजकल की सरंचनाएं तो पांच या दस साल में ही दम तोड देती है, पर प्राचीन काल गए सालों हो गए है, पर ये रतनगढ में जल संरचना आज भी अपनी नींव पर नई जैसी ही खडी हुई है। नीमच जिला मुख्यायल से करीब 52 किलोमीटर दूर रतनगढ़ पडता है। जहां पर पुराने ज़माने के कुएं बनाये गए है जो प्राचीन काल से आज जल संरक्षण का बेजोड उदाहरण है। एक बड़ा कुआं, जिसकी बनावट बावड़ी टाइप है। इस बड़े कुएं के साथ वर्षा का जल कुएं तक पहुंचने के लिए सहायक चार कुएं और बनने हुए है, जो बडे कुएं से 200 मीटर की दूरी पर है। कुई के अंदरर भूमीगत नालियों का निर्माण् कर बड़े कुए को भी जोडा गया है। जो रतनगढ किले के पानी को एकत्रित करती है। प्राचीनकाल की उद्भूत जल संरचनाएं आज भी हर वर्ग का मन मोह रही है वहीं दूसरी बूंद—बूंद पानी सहेजने की जिम्मेदारी का संदेश पहुंचा रही है।
रतनगढ़ किले में पहुचने का मार्ग
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https://goo.gl/maps/r5AAsR8niho


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